प्रथम विश्व युद्ध और भारत
- अनिल वर्मा
ब्रिटिश काउंसिल द्वारा प्रथम विश्व युद्ध के बारे में हाल में ही कराये गए एक सर्वे में २५ % भारतीयों ने यह बताया है कि प्रथम विश्व युद्ध में भारत ब्रिटेन के खिलाफ लड़ा था ,जबकि वास्तव में इस महायुद्ध में भारतीय ब्रिटिश हूकूमत की ओर से लड़े थे, क्योकि इस युद्ध के समय भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना (जिसे कभी-कभी ब्रिटिश भारतीय सेना कहा जाता है) ने प्रथम विश्व युद्ध में यूरोपीय, भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्व के युद्ध क्षेत्रों में अपने अनेक डिविजनों और स्वतंत्र ब्रिगेडों का योगदान दिया था. दस लाख भारतीय सैनिकों ने विदेशों में अपनी सेवाएं दी थीं .1914 में ब्रिटिश नियंत्रण वाली भारतीय सेना दुनिया में सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना थी, जिसकी कुल क्षमता 2 लाख 40 हजार लोगों की थी। नंवबर 1918 तक इसमें 548,311 लोग शामिल हो गए थे। 13 लाख भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया था, जिसमें 62 हजार सैनिक मारे गए थे और 67 हजार के करीब घायल हो गए थे। युद्ध के दौरान कुल मिलाकर 74,187 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी। विश्व प्रथम विश्व युद्ध (1914 - 1918) का यह शताब्दी उत्सव यह भारत के लाखों सैनिकों के बलिदान की याद दिलाता है।
प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सेना ने जर्मन पूर्वी अफ्रीका और पश्चिमी मोर्चे पर जर्मन साम्राज्य के खिलाफ युद्ध किया. भारत के सिपाही फ्रांस और बेल्जियम, एडीन, अरब, पूर्व अफ्रीका, गाली पोली, मिस्र, मेसोपेटामिया, फिलिस्तीन, पर्सिया और सालोनिका सहित विश्व भर में लगभग पचास देशों में लड़ाई के मैदानों में बड़े सम्मान के साथ लड़े और वहीं उनकी मृत्यु हो गई . गढ़वाल राईफल्स रेजिमेन के दो सिपाहियो को संयुक्त राज्य का उच्चतम पदक 'विक्टोरिया क्रॉस' भी मिला था।यप्रेस के पहले युद्ध में खुदादाद खान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय बने. कुल १३ भारतियों को विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था। भारतीय डिवीजनों को मिस्र, गैलीपोली भी भेजा गया था और लगभग 700,000 सैनिकों ने तुर्क साम्राज्य के खिलाफ मेसोपोटामिया में अपनी सेवा दी थी. जबकि कुछ डिवीजनों को विदेश में भेजा गया था, अन्य को उत्तर पश्चिम सीमा की सुरक्षा के लिए और आंतरिक सुरक्षा तथा प्रशिक्षण कार्यों के लिए भारत में ही रहना पड़ा था.। रियासतों के राजाओं ने इस युद्ध में दिल खोलकर ब्रिटेन की आर्थिक और सैनिक सहायता की। 1,70,000 जानवरों के अलावा 37 लाख टन अनाज भारत की तरफ से युद्ध में भेजा गया। भारत ने युद्ध के प्रयासों में जनशक्ति और सामग्री दोनों रूप से भरपूर योगदान किया।
इस युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग दिवालिया हो गयी थी। भारत के राजनेता यह आशान्वित थे कि युद्ध में ब्रिटेन के समर्थन से खुश होकर अंग्रेज भारत को इनाम के रूप में स्वतंत्रता दे देंगे या कम से कम स्वशासन का अधिकार देंगे , किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जबकि सन १९१७ में रूस में क्रांति होने वह सम्राज्यवादी ताकतों के चंगुल से मुक्त हो गया था। वास्तव में कांग्रेस के नेताओ के इस गलत फैसले से भारत के स्वाधीनता आंदोलन को भारी नुकसान पॅहुचा और फिर अंग्रेजों ने युद्ध समाप्त होते ही सन १९१९ में जलियावाला बाग़ के कत्लेआम के घिनौने कृत्य से भारतीय जनता के मुँह पर करारा तमाचा मारा था।
- अनिल वर्मा
ब्रिटिश काउंसिल द्वारा प्रथम विश्व युद्ध के बारे में हाल में ही कराये गए एक सर्वे में २५ % भारतीयों ने यह बताया है कि प्रथम विश्व युद्ध में भारत ब्रिटेन के खिलाफ लड़ा था ,जबकि वास्तव में इस महायुद्ध में भारतीय ब्रिटिश हूकूमत की ओर से लड़े थे, क्योकि इस युद्ध के समय भारत औपनिवेशिक शासन के अधीन था।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना (जिसे कभी-कभी ब्रिटिश भारतीय सेना कहा जाता है) ने प्रथम विश्व युद्ध में यूरोपीय, भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्व के युद्ध क्षेत्रों में अपने अनेक डिविजनों और स्वतंत्र ब्रिगेडों का योगदान दिया था. दस लाख भारतीय सैनिकों ने विदेशों में अपनी सेवाएं दी थीं .1914 में ब्रिटिश नियंत्रण वाली भारतीय सेना दुनिया में सबसे बड़ी स्वयंसेवी सेना थी, जिसकी कुल क्षमता 2 लाख 40 हजार लोगों की थी। नंवबर 1918 तक इसमें 548,311 लोग शामिल हो गए थे। 13 लाख भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्वयुद्ध में हिस्सा लिया था, जिसमें 62 हजार सैनिक मारे गए थे और 67 हजार के करीब घायल हो गए थे। युद्ध के दौरान कुल मिलाकर 74,187 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी। विश्व प्रथम विश्व युद्ध (1914 - 1918) का यह शताब्दी उत्सव यह भारत के लाखों सैनिकों के बलिदान की याद दिलाता है।
प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय सेना ने जर्मन पूर्वी अफ्रीका और पश्चिमी मोर्चे पर जर्मन साम्राज्य के खिलाफ युद्ध किया. भारत के सिपाही फ्रांस और बेल्जियम, एडीन, अरब, पूर्व अफ्रीका, गाली पोली, मिस्र, मेसोपेटामिया, फिलिस्तीन, पर्सिया और सालोनिका सहित विश्व भर में लगभग पचास देशों में लड़ाई के मैदानों में बड़े सम्मान के साथ लड़े और वहीं उनकी मृत्यु हो गई . गढ़वाल राईफल्स रेजिमेन के दो सिपाहियो को संयुक्त राज्य का उच्चतम पदक 'विक्टोरिया क्रॉस' भी मिला था।यप्रेस के पहले युद्ध में खुदादाद खान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय बने. कुल १३ भारतियों को विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था। भारतीय डिवीजनों को मिस्र, गैलीपोली भी भेजा गया था और लगभग 700,000 सैनिकों ने तुर्क साम्राज्य के खिलाफ मेसोपोटामिया में अपनी सेवा दी थी. जबकि कुछ डिवीजनों को विदेश में भेजा गया था, अन्य को उत्तर पश्चिम सीमा की सुरक्षा के लिए और आंतरिक सुरक्षा तथा प्रशिक्षण कार्यों के लिए भारत में ही रहना पड़ा था.। रियासतों के राजाओं ने इस युद्ध में दिल खोलकर ब्रिटेन की आर्थिक और सैनिक सहायता की। 1,70,000 जानवरों के अलावा 37 लाख टन अनाज भारत की तरफ से युद्ध में भेजा गया। भारत ने युद्ध के प्रयासों में जनशक्ति और सामग्री दोनों रूप से भरपूर योगदान किया।
यह
बात प्रथम विश्वयुद्ध के सौ वर्ष पूरे होने पर ब्रिटिश काउंसिल द्वारा
किए सर्वे में सामने आई है। हालांकि सच्चाई यह है कि भारत उस समय ब्रिटेन
का हिस्सा था और भारतीय सैनिक उसकी ओर से लड़े थे।
1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध के बारे में लोगों की जानकारी का पता लगाने ब्रिटिश काउंसिल ने एक सर्वे किया है। इस सर्वे में भारत के साथ ही मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, रूस, टर्की और ब्रिटेन के लोगों को शामिल किया गया। इस दौरान भारतीयों से जब यह पूछा गया कि भारत ने तब किस देश के खिलाफ युद्ध किया था, तो 25 प्रतिशत लोगों ने ब्रिटेन का नाम लिया।
गौरतलब है कि प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना में भारतीयों की अहम भूमिका थी। उस वक्त ब्रिटिश सेना में दस लाख से भी अधिक भारतीय सैनिक शामिल थे। एक अनुमान के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लगभग एक लाख भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे।
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युद्ध आरम्भ होने के पहले जर्मनों ने पूरी कोशिश की थी कि भारत में
ब्रिटिश हूकूमत के विरुद्ध आन्दोलन भड़काया जाये , उसे यह आशा थी कि
ब्रिटेन के इस युद्ध में फंसने की स्थिति में भारत के क्रान्तिकारी इस
अवसर का लाभ
उठाकर देश से अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने में में सफल हो जाएंगे। किन्तु
भारत के बड़े नेताओं ने इस युद्ध में ब्रिटेन को
समर्थन देकर ब्रिटिश चिन्तकों को भी चौंका दिया था। भारतीय कांग्रेस
के नेताओं की यह बहुत अजीब हास्यास्पद धारणा थी कि स्वतंत्रता की प्राप्ति
के लिए इस समय ब्रिटेन की
सहायता की जानी चाहिए और जब ४ अगस्त को युद्ध आरम्भ हुआ , तो ब्रिटेन ने भारत
के इन प्रमुख नेताओं को अपने पक्ष में कर लिया। 1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध के बारे में लोगों की जानकारी का पता लगाने ब्रिटिश काउंसिल ने एक सर्वे किया है। इस सर्वे में भारत के साथ ही मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, रूस, टर्की और ब्रिटेन के लोगों को शामिल किया गया। इस दौरान भारतीयों से जब यह पूछा गया कि भारत ने तब किस देश के खिलाफ युद्ध किया था, तो 25 प्रतिशत लोगों ने ब्रिटेन का नाम लिया।
गौरतलब है कि प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना में भारतीयों की अहम भूमिका थी। उस वक्त ब्रिटिश सेना में दस लाख से भी अधिक भारतीय सैनिक शामिल थे। एक अनुमान के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लगभग एक लाख भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे।
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इस युद्ध के कारण भारत की अर्थव्यवस्था लगभग दिवालिया हो गयी थी। भारत के राजनेता यह आशान्वित थे कि युद्ध में ब्रिटेन के समर्थन से खुश होकर अंग्रेज भारत को इनाम के रूप में स्वतंत्रता दे देंगे या कम से कम स्वशासन का अधिकार देंगे , किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जबकि सन १९१७ में रूस में क्रांति होने वह सम्राज्यवादी ताकतों के चंगुल से मुक्त हो गया था। वास्तव में कांग्रेस के नेताओ के इस गलत फैसले से भारत के स्वाधीनता आंदोलन को भारी नुकसान पॅहुचा और फिर अंग्रेजों ने युद्ध समाप्त होते ही सन १९१९ में जलियावाला बाग़ के कत्लेआम के घिनौने कृत्य से भारतीय जनता के मुँह पर करारा तमाचा मारा था।
यह
बात प्रथम विश्वयुद्ध के सौ वर्ष पूरे होने पर ब्रिटिश काउंसिल द्वारा
किए सर्वे में सामने आई है। हालांकि सच्चाई यह है कि भारत उस समय ब्रिटेन
का हिस्सा था और भारतीय सैनिक उसकी ओर से लड़े थे।
1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध के बारे में लोगों की जानकारी का पता लगाने ब्रिटिश काउंसिल ने एक सर्वे किया है। इस सर्वे में भारत के साथ ही मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, रूस, टर्की और ब्रिटेन के लोगों को शामिल किया गया। इस दौरान भारतीयों से जब यह पूछा गया कि भारत ने तब किस देश के खिलाफ युद्ध किया था, तो 25 प्रतिशत लोगों ने ब्रिटेन का नाम लिया।
गौरतलब है कि प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना में भारतीयों की अहम भूमिका थी। उस वक्त ब्रिटिश सेना में दस लाख से भी अधिक भारतीय सैनिक शामिल थे। एक अनुमान के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लगभग एक लाख भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे।
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1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध के बारे में लोगों की जानकारी का पता लगाने ब्रिटिश काउंसिल ने एक सर्वे किया है। इस सर्वे में भारत के साथ ही मिस्र, फ्रांस, जर्मनी, रूस, टर्की और ब्रिटेन के लोगों को शामिल किया गया। इस दौरान भारतीयों से जब यह पूछा गया कि भारत ने तब किस देश के खिलाफ युद्ध किया था, तो 25 प्रतिशत लोगों ने ब्रिटेन का नाम लिया।
गौरतलब है कि प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना में भारतीयों की अहम भूमिका थी। उस वक्त ब्रिटिश सेना में दस लाख से भी अधिक भारतीय सैनिक शामिल थे। एक अनुमान के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लगभग एक लाख भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे।
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बोस्निया
की राजधानी साराजेवो ने शनिवार को प्रथम विश्व युद्ध के सौ साल पूरे होने
के मौके पर उस हत्याकांड को याद किया, जिसने पूरी दुनिया को युद्ध की आग
में झोंक दिया था। 28 जून, 1914 को ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकारी आर्चड्यूक
फर्डिनेंड और उनकी पत्नी की हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद पूरी दुनिया चार
साल तक युद्ध की आग धधकती रही।
विएना के प्रमुख आर्केस्ट्रा ने एक समारोह के दौरान लोगों को एकता का संदेश देती घुनें बजाईं। यूरोप के कई प्रसारकों ने इस समारोह का सीधा प्रसारण किया। युद्ध के जख्मों से आज भी जूझ रहे बोस्निया के पूर्व युद्धरत समुदायों ने एकत्र होकर फर्डिनेंड, उनकी पत्नी और उनकी विरासत को याद किया। हालांकि सर्बिया और बोस्नियाई सर्ब के नेताओं ने साराजेवो के आयोजन का बहिष्कार किया। सर्बिया फर्डिनेंड की हत्या को एक बहादुरी के कार्य के रूप में देखता है। एक सर्ब राष्ट्रवादी गैवरिलो प्रिंसिप ने ही ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकारी और उनकी पत्नी की हत्या की थी।
राजधानी के सिटी हॉल में आयोजित समारोह में ऑस्ट्रिया के राष्ट्रपति हेंज फिचेर मुख्य अतिथि थे। 28 जून, 1914 में इसी जगह पर फर्डिनेंड एक समारोह में शामिल हुए थे। समारोह के बाद आर्च ड्यूक पत्नी के साथ कार में रवाना हुए लेकिन ड्राइवर ने कार गलत दिशा में मोड़ दी। यहीं नदी के किनारे प्रिंसिप ने इस शाही जोड़े को गोली मार दी। हत्याकांड के बाद घटनाओं की जो श्रंखला शुरू हुई, उसके केवल छह सप्ताह बाद ही जंग शुरू हो गई। कुछ ही दिनों में जर्मनी के समर्थन वाले ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया को चेतावनी जारी की और युद्ध का एलान कर दिया। इसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि यह संघर्ष चार साल तक चले महायुद्ध में तब्दील हो गया।
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- अनिल वर्मा विएना के प्रमुख आर्केस्ट्रा ने एक समारोह के दौरान लोगों को एकता का संदेश देती घुनें बजाईं। यूरोप के कई प्रसारकों ने इस समारोह का सीधा प्रसारण किया। युद्ध के जख्मों से आज भी जूझ रहे बोस्निया के पूर्व युद्धरत समुदायों ने एकत्र होकर फर्डिनेंड, उनकी पत्नी और उनकी विरासत को याद किया। हालांकि सर्बिया और बोस्नियाई सर्ब के नेताओं ने साराजेवो के आयोजन का बहिष्कार किया। सर्बिया फर्डिनेंड की हत्या को एक बहादुरी के कार्य के रूप में देखता है। एक सर्ब राष्ट्रवादी गैवरिलो प्रिंसिप ने ही ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकारी और उनकी पत्नी की हत्या की थी।
राजधानी के सिटी हॉल में आयोजित समारोह में ऑस्ट्रिया के राष्ट्रपति हेंज फिचेर मुख्य अतिथि थे। 28 जून, 1914 में इसी जगह पर फर्डिनेंड एक समारोह में शामिल हुए थे। समारोह के बाद आर्च ड्यूक पत्नी के साथ कार में रवाना हुए लेकिन ड्राइवर ने कार गलत दिशा में मोड़ दी। यहीं नदी के किनारे प्रिंसिप ने इस शाही जोड़े को गोली मार दी। हत्याकांड के बाद घटनाओं की जो श्रंखला शुरू हुई, उसके केवल छह सप्ताह बाद ही जंग शुरू हो गई। कुछ ही दिनों में जर्मनी के समर्थन वाले ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया को चेतावनी जारी की और युद्ध का एलान कर दिया। इसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि यह संघर्ष चार साल तक चले महायुद्ध में तब्दील हो गया।
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